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अपने ब्लॉग "समय का पुराना इतिहासकार" में अरुण तिवारी भारत के घंटाघरों (Clock Towers) के इतिहास, उनसे जुड़ी व्यक्तिगत स्मृतियों और समय के महत्व पर विचार प्रस्तुत करते हैं। इस लेख की प्रेरणा उन्हें डॉ. यतीन्द्र पाल (वाईपी) सिंह की पुस्तक *"Clock Towers of India"* पढ़ने से मिली।
ब्लॉग की शुरुआत एक प्रसिद्ध पंक्ति से होती है—
"घंटाघर की चार घड़ी, चारों में जंजीर पड़ी।"
अरुण तिवारी बताते हैं कि यह पंक्ति उत्तर भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान लोकप्रिय थी। इसका अर्थ केवल घंटाघर की घड़ियों का वर्णन करना नहीं था, बल्कि यह अंग्रेजी शासन के अधीन भारत की स्थिति का प्रतीक भी थी। जिस प्रकार घड़ियाँ जंजीरों में बंधी दिखाई देती थीं, उसी प्रकार देश भी ब्रिटिश शासन की बेड़ियों में जकड़ा हुआ था। इसलिए यह कविता स्वतंत्रता की आकांक्षा और विदेशी सत्ता के विरोध का प्रतीक बन गई थी।
अरुण तिवारी बताते हैं कि वे और वाईपी सिंह दोनों जीबी पंत विश्वविद्यालय के छात्र रहे हैं। पुस्तक पढ़ते समय उनकी अनेक पुरानी यादें ताज़ा हो गईं, विशेषकर मेरठ के प्रसिद्ध घंटाघर से जुड़ी स्मृतियाँ। वे याद करते हैं कि बचपन में स्कूल जाते समय वे घंटाघर के नीचे से गुजरते थे और गर्मियों की रातों में उसके घंटों की आवाज़ सुना करते थे।
वे मेरठ के कंबोह गेट और बाद में बने नेताजी सुभाष चंद्र बोस द्वार का उल्लेख करते हैं। उनके अनुसार घंटाघर केवल समय बताने वाली इमारतें नहीं थे, बल्कि वे शहरों के इतिहास, संस्कृति और सामूहिक स्मृतियों का महत्वपूर्ण हिस्सा थे। वे अपने परिवार के साथ घंटाघर की ऊँचाई से शहर देखने की एक घटना भी साझा करते हैं, जिसने उनके मन पर गहरा प्रभाव छोड़ा।
लेख में अरुण तिवारी लंदन के प्रसिद्ध बिग बेन का भी उल्लेख करते हैं। वे बताते हैं कि 2016 में उन्होंने स्वयं बिग बेन को देखा और उसकी भव्यता, तकनीकी सटीकता तथा स्थापत्य कला से अत्यंत प्रभावित हुए। इसके माध्यम से वे यह दिखाते हैं कि घंटाघर दुनिया भर में समय, अनुशासन और सभ्यता के प्रतीक रहे हैं।
पुस्तक के संदर्भ में वे बताते हैं कि अंग्रेजों ने भारत में अनेक घंटाघर अपनी सत्ता और प्रशासनिक व्यवस्था के प्रदर्शन के लिए बनवाए थे। हालांकि समय के साथ ये संरचनाएँ जनता के जीवन का अभिन्न हिस्सा बन गईं और लोगों में समय की पाबंदी तथा अनुशासन की भावना विकसित करने में सहायक रहीं।
अरुण तिवारी अपनी व्यक्तिगत स्मृतियों का उल्लेख करते हुए बताते हैं कि उन्हें पहली घड़ी अपने पिता से मिली थी। पिता के निधन के बाद उन्होंने घड़ी पहनना लगभग छोड़ दिया। बाद में एक मित्र ने उन्हें एक महंगी रोलेक्स घड़ी उपहार में दी, लेकिन उन्होंने उसे भी नहीं पहना। उनके लिए घड़ी केवल समय बताने का साधन नहीं, बल्कि भावनात्मक स्मृतियों का प्रतीक रही है।
आज के डिजिटल युग पर टिप्पणी करते हुए वे कहते हैं कि मोबाइल फोन ने हर व्यक्ति को समय की जानकारी उपलब्ध करा दी है, लेकिन इसके बावजूद लोग समय का सदुपयोग कम और दुरुपयोग अधिक कर रहे हैं। वे चार्ल्स डार्विन के उस प्रसिद्ध कथन को उद्धृत करते हैं कि जो व्यक्ति एक घंटे का समय भी व्यर्थ गंवाने का साहस करता है, उसने जीवन का मूल्य नहीं समझा है।
लेख के अंतिम भाग में अरुण तिवारी भारत के अनेक घंटाघरों की उपेक्षित स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हैं। उनका मानना है कि जो राष्ट्र अपनी विरासत का सम्मान नहीं करता, वह भविष्य में गौरव प्राप्त करने की क्षमता खो सकता है। वे पाठकों को अपनी जड़ों, इतिहास और सांस्कृतिक धरोहर से जुड़े रहने की सलाह देते हैं।
अंततः अरुण तिवारी यह संदेश देते हैं कि समय जीवन की सबसे मूल्यवान संपत्ति है। बाहरी घड़ियाँ हमें समय दिखा सकती हैं, लेकिन जीवन का वास्तविक अर्थ हमारी आंतरिक चेतना और समय के सदुपयोग में निहित है। इसलिए मनुष्य को केवल घंटों और मिनटों की चिंता करने के बजाय अपने जीवन के उद्देश्य, अपनी सांसों और अपने कर्मों पर ध्यान देना चाहिए, क्योंकि बीता हुआ समय कभी लौटकर नहीं आता।
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