सड़कों पर बेसहारा छोड़ देते हैं मवेशी, लेकिन भोजन के लिए इस्तेमाल पर हो जाते हैं आहत: सुप्रीम कोर्ट
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने आवारा मवेशियों की बढ़ती समस्या पर सख्त टिप्पणी
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नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने आवारा मवेशियों की बढ़ती समस्या पर सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि समाज में एक बड़ा विरोधाभास देखने को मिलता है। लोग जब तक मवेशियों से आर्थिक लाभ मिलता है तब तक उन्हें पालते हैं, लेकिन उनकी उपयोगिता कम होने पर उन्हें सड़कों पर बेसहारा छोड़ देते हैं। वहीं, यदि कोई व्यक्ति उन्हें भोजन के लिए इस्तेमाल करे तो लोग गहरा आक्रोश जताते हैं।
न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने कहा कि आदर्श स्थिति में जिस व्यक्ति ने किसी पशु को पाला है, उसकी पूरी उम्र तक देखभाल करना उसकी जिम्मेदारी होनी चाहिए। हालांकि, आर्थिक कठिनाइयों के कारण कई किसान और डेयरी संचालक ऐसा नहीं कर पाते, लेकिन पशुओं को सड़कों पर छोड़ देना किसी भी स्थिति में समाधान नहीं है।
अदालत ने कहा कि यदि कोई पशुपालक अपने मवेशी की देखभाल करने में सक्षम नहीं है, तो उसे अधिकृत गौशाला या पशु आश्रय गृह तक सुरक्षित पहुंचाने की जिम्मेदारी निभानी चाहिए।
यह टिप्पणी पंजाब के संगरूर में वर्ष 2007 में आवारा सांड के हमले में एक व्यक्ति की मौत से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान की गई। सुप्रीम कोर्ट ने मृतक की पत्नी को 15 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश देते हुए केंद्र और राज्यों को आवारा मवेशियों की समस्या से निपटने के लिए ठोस कदम उठाने की सिफारिश की।
अदालत ने कहा कि सड़कों और राष्ट्रीय राजमार्गों पर मवेशियों का घूमना गंभीर जनसुरक्षा का मुद्दा बन चुका है। कोर्ट ने राज्यों को मवेशियों की टैगिंग, डिजिटल रिकॉर्ड तैयार करने, पशु आश्रय गृहों की निगरानी, दुर्घटना पीड़ितों के लिए मुआवजा व्यवस्था लागू करने और पशु संरक्षण कानूनों का प्रभावी पालन सुनिश्चित करने की सलाह दी है। साथ ही, फैसले की प्रति सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्य सचिवों को भेजने का निर्देश भी दिया गया।